हरिद्वार (आरसी / संदीप कुमार) उत्तराखंड की राजनीति में हरिद्वार का अपना अलग ही मिजाज है। यहाँ की तीन सीटें—पिरान कलियर, मंगलौर और भगवानपुर—भारतीय जनता पार्टी के लिए किसी अभेद्य किले से कम नहीं हैं। मोदी लहर हो या ‘धामी’ का जादू, इन तीन सीटों पर आकर भाजपा की चुनावी कश्ती अक्सर किनारों पर ही दम तोड़ देती है।
पिरान कलियर: फुरकान अहमद का ‘अंगद’ वाला पैर
साल 2012 में परिसीमन के बाद यह सीट अस्तित्व में आई। भाजपा को लगा था कि यहाँ नया खाता खुलेगा, लेकिन कांग्रेस के फुरकान अहमद ने यहाँ ऐसी घेराबंदी की है कि भाजपा अब तक सेंधमारी नहीं कर पाई।
हकीकत: 2012, 2017 और 2022—हैट्रिक मारकर फुरकान अहमद ने साबित कर दिया है कि कलियर की गलियों में फिलहाल ‘हाथ’ का ही साथ है। यहाँ भाजपा के लिए जीत का इंतज़ार एक दशक से ज्यादा लंबा हो चुका है।
मंगलौर: ढाई दशकों का ‘वनवास’ और उपचुनाव की टीस
अगर भाजपा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द कोई सीट है, तो वह मंगलौर है। पिछले ढाई दशकों से यहाँ भाजपा को सिर्फ हार का स्वाद चखना पड़ा है।
सियासी खेल: 2002 से 2012 तक यहाँ बसपा का ‘हाथी’ झूमता रहा। 2017 में कांग्रेस आई, फिर 2022 में बसपा ने वापसी की।
ताजा जख्म: 2024 के उपचुनाव में भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी थी, लेकिन फिर भी बाजी कांग्रेस के हाथ लगी। मंगलौर भाजपा के लिए वो ‘अनसुलझी पहेली’ बन गई है जिसे सुलझाने में हर रणनीति फेल साबित हो रही है।
भगवानपुर: हाथ से फिसली बाजी
भगवानपुर की कहानी थोड़ी अलग है। साल 2002 में यहाँ भाजपा का परचम लहराया था, लेकिन उसके बाद जैसे नजर लग गई।
सफ़र: 2007 और 2012 में यह सीट बसपा की झोली में गई। उसके बाद समीकरण बदले और 2017 व 2022 में कांग्रेस ने यहाँ अपना कब्जा जमा लिया। भाजपा यहाँ अपनों और परायों के बीच वोट बैंक के गणित में उलझकर रह गई है।
विश्लेषण: क्यों अटक रही है भाजपा?
इन तीनों सीटों पर भाजपा की विफलता के पीछे ध्रुवीकरण का फेल होना और स्थानीय समीकरणों का हावी होना सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। जहाँ पिरान कलियर और मंगलौर में अल्पसंख्यक और दलित समीकरण भाजपा की राह रोकते हैं, वहीं भगवानपुर में कांग्रेस का मजबूत कैडर दीवार बनकर खड़ा है।
बड़ा सवाल: क्या 2027 के चुनावी महाकुंभ में भाजपा इन तीन अभेद्य किलों को ढहा पाएगी, या फिर हरिद्वार का यह ‘त्रिकोण’ बीजेपी के लिए फिर से ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा देगा?
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