पिथौरागढ़ (आरसी / संदीप कुमार) सोशल ब्लू फ्रंट के बैनर तले अपनी मांगों को लेकर लंबे समय से संघर्षरत इस आंदोलन की पृष्ठभूमि और संघर्ष की लंबी यात्रा पर प्रकाश डालते हुए सोशल ब्लू फ्रंट के संस्थापक कार्तिक टम्टा ने बताया कि इस हक की लड़ाई का आगाज पिथौरागढ़ की सरजमीं से हुआ था। आंदोलन के विस्तार के दौरान कुछ समय तक रुड़की स्थित रविदास घाट पर भी धरना दिया गया, जहाँ एसडीएम रुड़की के माध्यम से संगठन की मांगों को शासन तक पहुँचाया गया। रुड़की से लौटने के बाद कार्तिक टम्टा ने संघर्ष को धरातल पर दिखाने के लिए पिथौरागढ़ के डाकुंडा से गुरना इंटर कॉलेज तक लगभग 13 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा की। इस यात्रा में तमाम जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को आमंत्रित किया गया था। जिसका उद्देश्य उन्हें यह रूबरू कराना था कि किस प्रकार आज भी पहाड़ के बच्चे रोजमर्रा के जीवन में संघर्ष करते हुए अपनी पढ़ाई की यात्रा तय करते हैं। इसी जमीनी संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए कार्तिक टम्टा ने पिथौरागढ़ के रामलीला मैदान टकाना में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल रखी, जिसे लगभग आठ दिनों बाद जिला प्रशासन ने संगठन की मांगो पर विचार करने की सहमति के बाद समाप्त किया गया।
इसके बाद जिलाधिकारी उपजिलाधिकारी और मुख्य शिक्षा अधिकारी पिथौरागढ़ के साथ हुई बैठक में प्रशासन ने संगठन की समस्त स्थानीय मांगों पर न केवल लिखित और मौखिक सहमति जताई, बल्कि समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए एक निश्चित समय-सीमा भी निर्धारित की है। संगठन ने इस सफलता को अपनी एकजुटता और लोकतांत्रिक संघर्ष की विजय करार दिया है। कार्यकर्ताओं में इस जीत को लेकर भारी उत्साह है और उन्होंने इसे न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है।
हालांकि, जिला स्तर पर मिली इस कामयाबी के बावजूद सोशल ब्लू फ्रंट ने साफ कर दिया है कि उनका आंदोलन अभी थमा नहीं है। संस्थापक कार्तिक टम्टा ने स्पष्ट किया कि उनकी कई महत्वपूर्ण मांगें अभी भी शासन और राज्य स्तर पर लंबित हैं, जिन पर सरकार का रवैया अब तक उदासीन रहा है। शासन की इसी बेरुखी के खिलाफ अब संगठन ने अपने आंदोलन को और व्यापक बनाने का निर्णय लिया है। सोशल ब्लू फ्रंट ने आधिकारिक घोषणा की है कि जिला स्तर पर न्याय मिलने के बाद अब उनकी लड़ाई प्रदेश की राजधानी में लड़ी जाएगी। संगठन जल्द ही ‘देहरादून कूच’ और प्रदेश व्यापी प्रदर्शन की रणनीति साझा करेगा। फ्रंट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि जब तक अंतिम मांग पूरी नहीं हो जाती, संघर्ष की यह मशाल जलती रहेगी।
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